आख़िर पुलिस ने उन चार लोगों के ख़िलाफ़ जांच क्यों नहीं की, जिन्हें चश्मदीद ने पुलिस फ़ाइल देखकर पहचाना था? सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस सवाल
का जवाब किसी के पास नहीं है.
आख़िर चश्मदीद ने अपना बयान बदलकर ग़लत आदमियों की शिनाख़्त क्यों ही? क्या ये मामला याददश्त जाने का था या फिर ग़लत पहचान का? या फिर चश्मदीद ने पुलिस के दबाव में बयान बदला? किसी को भी इन सवालों के जवाब नहीं पता.
सबसे अहम बात ये है कि आख़िर पुलिस ने इन छह बेगुनाह लोगों को क्यों गिरफ़्तार किया? ये तो घटनास्थल से क़रीब 300 किलोमीटर रह रहे थे. फिर पुलिस ने इन्हें क्यों वक़ील कहते हैं कि शिंदे भाइयों को पुलिस ने इसलिए फंसाया क्योंकि उनकी बिरादरी को अपराधी समुदाय माना जाता है. ये सोच अंग्रेज़ों के ज़माने से चली आ रही है. जब अंग्रेज़ों ने इस ग़रीब आदिवासी जनजाति को आपराधिक प्रवृत्ति का माना था. अंग्रेज़ों ने एक क़ानून बनाया था जिसमें इस जनजाति के सदस्यों को जन्मजात अपराधी बताया गया था. भारत के पुलिस मैनुअल में साफ़ लिखा है कि ऐसे आपराधिक समुदाय पर लगातार निगरानी रखी जानी चाहिए. उनके परिवार के सदस्यों को संदेह की नज़र से देखा जाना चाहिए.
इनमें से तीन लोगों को नासिक हत्याकांड से एक महीने पहले हुई हत्या में भी फंसाने की कोशिश की गई थी. लेकिन, पुलिस ने उन्हें इस मामले में निर्दोष मानकर 2014 में बरी कर दिया था.
उन्हें बरी करने वाले सुप्रीम कोर्ट के जज भी इस बात को मानते हैं. इसीलिए उन्होंने अपने फ़ैसले में लिखा, ''आरोपी घुमंतू क़बीलों से ताल्लुक़ रखते हैं और समाज के निचले तबक़े से आते हैं. वो बहुत ग़रीब मज़दूर हैं. इसी वजह से उन्हें ग़लत तरीक़े से फंसाए जाने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता क्योंकि गंभीर अपराधों में बेगुनाहों को फंसाए जाने की घटनाएं आम हैं.''
आख़िर में शिंदे भाइयों के साथ हुआ, वो हमारे देश की न्यायिक व्यवस्था की गंभीर ख़ामी को उजागर करता है. इससे साफ़ है कि अपराधों से निपटने की हमारी न्यायिक व्यवस्था ग़रीब विरोधी है.
दिल्ली स्थित नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में क़ानून पढ़ाने वाले अनूप सुरेंद्रनाथ कहते हैं, ''शिंदे भाइयों ने जो तकलीफ़ झेली, वो मौत की सज़ा पाने वाले हर अपराधी की दास्तान है. हमारी न्यायिक व्यवस्था में बहुत सी खामियां हैं. वो ऐसी भयंकर ग़लतियां अक्सर कर बैठती है''.
वो आगे कहते हैं, ''अगर सुप्रीम कोर्ट समेत इस देश की तीन अदालतें, जांच एजेंसियों की तरफ़ से पेश किए गए सबूतों में गड़बड़ी को पकड़ नहीं सकीं. वो ये नहीं देख सकीं कि इन छह लोगों को ग़लत तरीक़े से फंसाया गया है. तो हम ये कैसे मान लें कि हमारी न्यायिक व्यवस्था के तहत जिन लोगों को मौत की सज़ा मिली है, वो सही है''.
इस वक़्त भारत में मौत की सजा पाने वाले 400 लोग जेलों में बंद हैं.
आख़िर चश्मदीद ने अपना बयान बदलकर ग़लत आदमियों की शिनाख़्त क्यों ही? क्या ये मामला याददश्त जाने का था या फिर ग़लत पहचान का? या फिर चश्मदीद ने पुलिस के दबाव में बयान बदला? किसी को भी इन सवालों के जवाब नहीं पता.
सबसे अहम बात ये है कि आख़िर पुलिस ने इन छह बेगुनाह लोगों को क्यों गिरफ़्तार किया? ये तो घटनास्थल से क़रीब 300 किलोमीटर रह रहे थे. फिर पुलिस ने इन्हें क्यों वक़ील कहते हैं कि शिंदे भाइयों को पुलिस ने इसलिए फंसाया क्योंकि उनकी बिरादरी को अपराधी समुदाय माना जाता है. ये सोच अंग्रेज़ों के ज़माने से चली आ रही है. जब अंग्रेज़ों ने इस ग़रीब आदिवासी जनजाति को आपराधिक प्रवृत्ति का माना था. अंग्रेज़ों ने एक क़ानून बनाया था जिसमें इस जनजाति के सदस्यों को जन्मजात अपराधी बताया गया था. भारत के पुलिस मैनुअल में साफ़ लिखा है कि ऐसे आपराधिक समुदाय पर लगातार निगरानी रखी जानी चाहिए. उनके परिवार के सदस्यों को संदेह की नज़र से देखा जाना चाहिए.
इनमें से तीन लोगों को नासिक हत्याकांड से एक महीने पहले हुई हत्या में भी फंसाने की कोशिश की गई थी. लेकिन, पुलिस ने उन्हें इस मामले में निर्दोष मानकर 2014 में बरी कर दिया था.
उन्हें बरी करने वाले सुप्रीम कोर्ट के जज भी इस बात को मानते हैं. इसीलिए उन्होंने अपने फ़ैसले में लिखा, ''आरोपी घुमंतू क़बीलों से ताल्लुक़ रखते हैं और समाज के निचले तबक़े से आते हैं. वो बहुत ग़रीब मज़दूर हैं. इसी वजह से उन्हें ग़लत तरीक़े से फंसाए जाने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता क्योंकि गंभीर अपराधों में बेगुनाहों को फंसाए जाने की घटनाएं आम हैं.''
आख़िर में शिंदे भाइयों के साथ हुआ, वो हमारे देश की न्यायिक व्यवस्था की गंभीर ख़ामी को उजागर करता है. इससे साफ़ है कि अपराधों से निपटने की हमारी न्यायिक व्यवस्था ग़रीब विरोधी है.
दिल्ली स्थित नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में क़ानून पढ़ाने वाले अनूप सुरेंद्रनाथ कहते हैं, ''शिंदे भाइयों ने जो तकलीफ़ झेली, वो मौत की सज़ा पाने वाले हर अपराधी की दास्तान है. हमारी न्यायिक व्यवस्था में बहुत सी खामियां हैं. वो ऐसी भयंकर ग़लतियां अक्सर कर बैठती है''.
वो आगे कहते हैं, ''अगर सुप्रीम कोर्ट समेत इस देश की तीन अदालतें, जांच एजेंसियों की तरफ़ से पेश किए गए सबूतों में गड़बड़ी को पकड़ नहीं सकीं. वो ये नहीं देख सकीं कि इन छह लोगों को ग़लत तरीक़े से फंसाया गया है. तो हम ये कैसे मान लें कि हमारी न्यायिक व्यवस्था के तहत जिन लोगों को मौत की सज़ा मिली है, वो सही है''.
इस वक़्त भारत में मौत की सजा पाने वाले 400 लोग जेलों में बंद हैं.
(बीबीसी
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