Monday, May 27, 2019

بالصور: في "يوم الغضب" كمبوديون يعيدون تمثيل مجازر الخمير الحمر

أدى مجموعة من الممثلين الكمبوديين عروضا تمثيلية توضح الفظائع والمجازر التي ارتكبها نظام الخمير الحمر في البلاد في اليوم الوطني للذكرى والمعروف باسم "يوم الغضب".
وقد سيطر النظام الدموي للزعيم الماوي بول بوت على كمبوديا بين عامي 1975 و 1979. ويعتقد أن إجمالى من قتلوا خلال فترة حكمة قد وصل إلى مليوني شخص.
وقد أجبر المدنيون على النزوح من المدن والعيش في مزارع جماعية في الريف كجزء من عملية إعادة التثقيف الثورية التي تهدف إلى إعادة هيكلة المجتمع الكمبودي جذريًا.
وقد أدى الممثلون هذه العروض في مركز، تشوي أنغ إي كاي، المختص بشؤون الإبادة الجماعية والواقع في المنطقة التي تعرف باسم "حقول القتل" التي شهدت عمليات القتل خارج العاصمة الكمبودية بنوم بنه.
عارضات الأزياء في مدينة ساو باولو في البرازيل معتادات على أماكن العرض الباذخة ومصممين بأسماء لامعة، لكنهن عرضن أزياءهن الأربعاء في سجن "أدريانو ماري" شديد الحراسة، لمصممين من نزلاء السجن.
باحة سجن بقضبان أصبحت مسرحا لعارضات أزياء يعرضن قطع ثياب محبوكة ومنقوشة. واصطف المصممون الفخورون بهذه القطع على امتداد الجدران للتأمل في إبداعاتهم.
استغل نايجل بول فاراج (55 عاما) الهجمات الإرهابية التي وقعت في كل من باريس وبروكسل عام 2015، للدعوة إلى ضرورة خروج بريطانيا من الاتحاد الأوروبي، وتحدث وقتها عن أزمة المهاجرين المتفاقمة في دول الاتحاد الأوروبي.
في مارس/آذار 2017، أعلنت تيريزا ماي، رئيسة وزراء بريطانيا الجديدة وقتها، رسمياً عن نية بلادها الخروج من الاتحاد الأوروبي، وأنها ستبرم خلال العامين التاليين اتفاقاً حول ذلك مع الاتحاد الأوروبي في محاولة منها للوصول إلى حل يرضي جميع الأطراف.
واجه اتفاق خروج بريطانيا من الاتحاد الأوروبي هزائم متتالية في البرلمان البريطاني، وارتفعت أصوات عديدة داخله تطالب بإجراء استفتاء ثان أو إلغاء بريكست برمته.
فأعلن فاراج الذي أسس حزب بريكست قبل أسابيع قليلة، أن مرشحي حزبه سيخوضون الانتخابات البرلمانية الأوروبية المقررة في 23 مايو/أيار 2019 وأن هدفه هو "تغيير السياسة" في المملكة المتحدة.
رفض الزعيم الجديد لحزب "استقلال المملكة المتحدة" جيرارد باتن الانضمام إلى حزب بريكست ووصف فاراج بأنه "منافق ويخدم مصالحه الخاصة"، في حين اتهم فاراج حزبه القديم بأنه أصبح معقلاً لليمين المتطرف.
شارك فاراج في تأسيس "حزب استقلال المملكة المتحدة" عام 1993، الذي يدعو إلى انسحاب بريطانيا من الاتحاد الأوروبي، وكان يقوده وقتها أستاذ الاقتصاد آلان آلسكيد، الذي شن حملة ضد معاهدة ماستريخت عام 1991 التي وقعتها بريطانيا بشأن الاتحاد الأووربي.
قاد فاراج المنحدر من أسرة ثرية "حزب استقلال المملكة المتحدة، UKIP" خلال الفترة ما بين 2006 - 2009. ثم ترك الحزب من أجل الترشح لمجلس العموم ممثلاً عن مقاطعة باكينغهامشاير.
وعندما تراجعت شعبية حزب الاستقلال في الانتخابات العامة للبلاد لعام 2010 إلى ثلاثة في المئة فقط ، وفشل في الفوز بأي مقعد في مجلس العموم، استأنف فاراج قيادة الحزب في الفترة بين 2010 -2016.
وتم انتخابه لعضوية البرلمان الأوروبي في أعوام 1999 و 2004 و 2009تناولت خطابات فاراج الموجهة إلى أنصاره كثيراً مسألة الهجرة والمهاجرين، وانتقد السياسات الحكومية في هذا المجال. وحث أنصاره على التصويت لصالح خروج بريطانيا من الاتحاد الأوروبي، مذكراً إياهم بالأيام الخوالي عندما كان "الاقتصاد أكثر صلابة، وكانت معدلات الهجرة محدودة وكانت بريطانيا أعظم".
كان حزب الاستقلال بزعامته أول حزب بريطاني في العصر الحديث ينتهج سياسات قومية دون أن يوصم بـ "الفاشية الجديدة".
وبعد الانتخابات العامة عام 2010، جذب فاراج العديد من أنصار حزب "الديمقراطيين الأحرار" وحزب "المحافظين" الذين لم يكونوا راضين عن أداء الحكومة الائتلافية بقيادة رئيس الوزراء السابق ديفيد كاميرون. فارتفع رصيده من الأصوات في الانتخابات المحلية في المملكة المتحدة إلى 14 في المئة في عام 2012 وحقق مكاسب كبيرة على حساب حزب المحافظين.
وفي الانتخابات المحلية لعام 2014، فاز حزب الاستقلال بأكثر من 160 مقعداً في مجالس البلديات.
قدم فاراج استقالته من قيادة حزب الاستقلال بسبب عدم فوزه في انتخابات البلاد البرلمانية لعام 2015. إلا أن اللجنة التنفيذية للحزب رفضت استقالته وبقي في منصبه حينها.
بعد ظهور نتائج الاستفتاء على خروج بريطانيا من الاتحاد الأوروبي في عام 2016، خاطب فاراج أنصاره المنتشين بانتصارهم، في لندن، قائلا "آن الأوان أن نحلم ببزوغ فجر بريطانيا المستقلة، هذه النتائج تعني أننا استعدنا بلدنا".
كان حلم فاراج بعيد المنال قبل نتائج الاستفتاء على بريكست، "لكن الأمر ليس ببعيد بعد الآن". وتخلى عن الكثير من آرائه المثيرة للجدل.
وكان بروز حزب استقلال المملكة المتحدة وزعيمه فاراج، أحد الأسباب الهامة التي شكلت ضغطاً على رئيس الوزراء السابق ديفيد كاميرون للموافقة على إجراء الإستفتاء.
وكثيرا ما تعرض فاراج لانتقادات شديدة بسبب مواقفه وخطاباته التي وصفها معارضوه بالعنصرية ومعاداة المهاجرين.
ويستخدم فاراج أسلوبا بسيطاً مباشراً في خطاباته، الأمر الذي جعله ناجحاً ومحبوباً من قبل أنصاره والكثيرين من كبار السن البيض وأصحاب المهن.
وعلى الرغم من دعوته للخروج من الاتحاد الأوروبي منذ البداية، إلا أن الحملة الرسمية للتصويت على الخروج نأت بنفسها عنه، خوفاً من أن توقعها مواقفه وتعليقاته المثيرة للجدل في مشكلات قد تؤثر على نتائج الاستفتاء.
وتزعم الحملة الرسمية لبريكست كلا من بوريس جونسون، الذي كان وقتها عمدة لندن، ومايكل غوف، الذي كان وزير العدل في حكومة ديفيد كاميرون.
وفي أبريل/نيسان الماضي، تم الاتفاق على تأجيل بريكست حتى أوكتوبر/تشرين الأول المقبل

Tuesday, May 14, 2019

जेल से बाहर रहने के लिए बनाई थी ये रणनीति

लेकिन यहाँ से सावरकर की दूसरी ज़िदगी शुरू होती है. सेल्युलर जेल में उनके काटे 9 साल 10 महीनों ने अंग्रेज़ों के प्रति सावरकर के विरोध को बढ़ाने के बजाय समाप्त कर दिया.
निरंजन तकले बताते हैं, "मैं सावरकर की ज़िंदगी को कई भागों में देखता हूँ. उनकी ज़िदगी का पहला हिस्सा रोमांटिक क्रांतिकारी का था, जिसमें उन्होंने 1857 की लड़ाई पर किताब लिखी थी. इसमें उन्होंने बहुत अच्छे शब्दों में धर्मनिरपेक्षता की वकालत की थी."
"गिरफ़्तार होने के बाद असलियत से उनका सामना हुआ. 11 जुलाई 1911 को सावरकर अंडमान पहुंचे और 29 अगस्त को उन्होंने अपना पहला माफ़ीनामा लिखा, वहाँ पहुंचने के डेढ़ महीने के अंदर. इसके बाद 9 सालों में उन्होंने 6 बार अंग्रेज़ों को माफ़ी पत्र दिए."
"जेल के रिकॉर्ड बताते हैं कि वहाँ हर महीने तीन या चार कैदियों को फाँसी दी जाती थी. फाँसी देने का स्थान उनके कमरे के बिल्कुल नीचे था. हो सकता है इसका सावरकर पर असर पड़ा हो. कुछ हलकों में कहा गया कि जेलर बैरी ने सावरकर को कई रियायतें दीं."
"एक और कैदी बरिंद्र घोष ने बाद में लिखा कि सावरकर बंधु हम लोगों को जेलर के ख़िलाफ़ आंदोलन करने के लिए गुपचुप तौर से भड़काते थे. लेकिन जब हम उनसे कहते कि खुल कर हमारे साथ आइए, तो वो पीछे हो जाते थे. उनको कोई भी मुश्किल काम करने के लिए नहीं दिया गया था."
निरंजन तकले कहते हैं, "हर 15 दिन पर वहाँ कैदी का वज़न लिया जाता था. जब सावरकर सेल्युलर जेल पहुंचे तो उनका वज़न 112 पाउंड था. सवा दो साल बाद जब उन्होंने सर रेजिनॉल्ड क्रेडॉक को अपना चौथा माफ़ीनामा दिया, तो उनका वज़न 126 पाउंड था. इस तरह उनका 14 पाउंड वज़न बढ़ा था जेल में रहने के दौरान."
"अपने ऊपर दया करने की गुहार करते हुए उन्होंने सरकार से ख़ुद को भारत की किसी जेल में भेजे जाने की प्रार्थना की थी. इसके बदले में वो किसी भी हैसियत में सरकार के लिए काम करने के लिए तैयार थे."
"सावरकर ने ये भी कहा था कि अंग्रेज़ों द्वारा उठाए गए गए कदमों से उनकी संवैधानिक व्यवस्था में आस्था पैदा हुई है और उन्होंने अब हिंसा का रास्ता छोड़ दिया है. शायद इसी का परिणाम था कि काला पानी की सज़ा काटते हुए सावरकर को 30 और 31 मई, 1919 को अपनी पत्नी और छोटे भाई से मिलने की इजाज़त दी गई थी."
बाद में सावरकर ने खुद और उनके समर्थकों ने अंग्रेज़ों से माफ़ी माँगने को इस आधार पर सही ठहराया था कि ये उनकी रणनीति का हिस्सा था, जिसकी वजह से उन्हें कुछ रियायतें मिल सकती थीं.
सावरकर ने अपनी आत्मकथा में लिखा था, "अगर मैंने जेल में हड़ताल की होती तो मुझसे भारत पत्र भेजने का अधिकार छीन लिया जाता."
मैंने वरिष्ठ पत्रकार और इंदिरा गांधी सेंटर ऑफ़ आर्ट्स के प्रमुख राम बहादुर राय से पूछा कि आख़िर भगत सिंह के पास भी माफ़ी माँगने का विकल्प था, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. तब सावरकर के पास ऐसा करने की क्या मजबूरी थी?
राम बहादुर राय का जवाब था, "भगत सिंह और सावरकर में बहुत मौलिक अंतर है. भगत सिंह ने जब बम फेंकने का फ़ैसला किया, उसी दिन उन्होंने तय कर लिया था कि उन्हें फाँसी का फंदा चाहिए. दूसरी तरफ़ वीर सावरकर एक चतुर क्रांतिकारी थे."
"उनकी कोशिश रहती थी कि भूमिगत रह करके उन्हें काम करने का जितना मौका मिले, उतना अच्छा है. मेरा मानना ये है कि सावरकर इस पचड़े में नहीं पड़े की उनके माफ़ी मांगने पर लोग क्या कहेंगे. उनकी सोच ये थी कि अगर वो जेल के बाहर रहेंगे तो वो जो करना चाहेंगे, वो कर सकेंगे."

Monday, September 10, 2018

«Wir werden vom Sekten-Chef terrorisiert»

Basel. Fatma Akin wirkt müde. Sie schlafe schlecht und seit Kurzem sei sie auch in psychiatrischer Behandlung. Der ewige Streit mit Scientologen in ihrem Haus gehe ihr langsam an die Substanz. Seit über neun Jahren wohnt das Ehepaar Hüseyin und Fatma Akin in einem sechsstöckigen Wohnhaus am Claraplatz. Das Paar werde notorisch von nächtlichen Klingelstreichen aus dem Schlaf gerissen. Es ertappe Scientologen im Treppenhaus dabei, wie sie ihre privaten Sachen durchwühlen und fotografieren. Zudem werde Fatma Akin vor ihrem Haus von den immer gleichen Scientologen belästigt. Sie würden ihr den Zugang zum Haus verwehren oder sie verbal angehen. Die kleine Frau wisse sich dagegen nicht zu wehren. «Ich verlasse das Haus nur noch mit Hüseyin zusammen», sagt Fatma Akin.
Doch weshalb wird ausgerechnet das Paar Akin vom «Poltergeist Scientology» heimgesucht? Die Eigentümerverhältnisse des Wohnhauses geben Aufschluss: Die Liegenschaft gehört dem Basler Scientology-Präsidenten Patrick Schnidrig, der mehrere Liegenschaften im Raum Basel besitzt. Darunter auch die Parzelle an der Burgfelderstrasse, wo die grösste Zentrale der Schweizer Scientology errichtet wurde. Seit Jahren betreibt die Sekte im ersten Stock in dem Haus am Claraplatz auch ein Büro. «Anfangs hatten wir ein sehr nettes Verhältnis mit Patrick Schnidrig», sagt Hüseyin Akin. Doch mit einigen grossen Umbauarbeiten im Haus und dem verstärkten Auftreten von Scientologen im und vor dem Haus sei die Lage eskaliert.
Fremde Hände in der Post
Das Hauptproblem der Akins mit den Sektenmitgliedern habe Anfang Jahr begonnen. «Aufgrund des Klingelterrors, haben wir eine Überwachungskamera am Hauseingang angebracht und da die Scientologen meine Frau bedrängten, zur Sicherheit auch eine bei der Haustüre», sagt Hüseyin Akin. Die Kamera vor dem Haus habe Schnidrig selber bewilligt, sie jedoch vor einigen Wochen wieder verboten.
Das Paar vermutete zudem, dass seine Stromrechnung künstlich in die Höhe getrieben wurde. Auf Nachfrage hätten die Industriellen Werke Basel denn auch bestätigt, dass der Strom für die Scientology-Werbefilme im Schaukasten vor dem Haus tatsächlich Akins berechnet worden sei. Schnidrig korrigierte und die Kosten halbierten sich.
Ein Fehler, der schnell behoben war, doch die Aufzeichnungen der Kameras bringen Schnidrig selbst in Erklärungsnot. Nicht als Immobilieneigentümer, sondern als Präsident von Scientology. Denn auf der Kamera sieht der Betrachter, wie zwei Scientologen, die sonst vor dem Haus missionieren, mit dem Lift in den dritten Stock fahren und die Schuhschränke des Paars durchwühlen und auch mal etwas mitgehen lassen. Ebenfalls sieht man vor dem Hauseingang, wie ein Mitarbeiter von Schnidrig die Briefkästen durchwühlt und sich die Post der Bewohner ansieht. Über seinen Chef lässt der Mitarbeiter mitteilen, dass er lediglich einen Hausschlüssel holen wollte, der von Scientology-Mitgliedern in den Briefkasten gelegt worden sei. Auf der Überwachungskamera sieht man, dass der Mitarbeiter gleich mehrere Kästen öffnet und deren Inhalt studiert.
Gängige Praxis
Auch der dort angestellte Hauswart, den man auf den Überwachungsbildern dabei sieht wie er die Schränke des Ehepaars Akin durchwühlt und diese fotografiert, ist Mitglied von Scientology. In einem E-Mail an das Ehepaar Akin bestreitet Schnidrig zuerst, dass sein Hauswart Mitglied der Sekte sei. Im Gespräch mit der BaZ räumt er dies jedoch ein, da man den Herrn des Öfteren beim Missionieren am Claraplatz trifft. «Er ist ebenfalls diplomierter Bauingenieur und schaute nach brennbarem Material in den Kästen. Diese sind gemäss Feuerschutzgesetz unberechtigt von Herr Akin dort angebracht worden», so Schnidirg.
Das Ausspionieren und Denunzieren von Menschen, die gegenüber Scientology kritisch eingestellt sind, ist eine gängige und systematische Praxis von Scientologen. Doch einfach klein beigeben will das Ehepaar Akin nicht. «Wir haben hier eine schöne Wohnung an günstiger Lage. Die wollen wir nicht aufgeben. Auch nicht wegen ein paar Scientologen.» Einen Rauswurf würde das Paar juristisch anfechten.